मनोजवं मारुततुल्यवेगं
जितेन्द्रियं बुद्धिमतां वरिष्ठम्।
वातात्मजं वानरयूथमुख्यं
श्रीरामदूतं शरणं प्रपद्ये ॥
दार्शनिक विवेचन (हिन्दी)
यह श्लोक आदर्श मनुष्य और आदर्श साधक की परिभाषा प्रस्तुत करता है, जिसे हनुमान जी के रूप में मूर्त किया गया है।
मनोजवं : मन के समान तीव्र गति — यहाँ यह संकेत है कि विचार और कर्म में विलंब न हो। जाग्रत चेतना वाला व्यक्ति वही है, जिसका मन लक्ष्य पर स्थिर और शीघ्र क्रियाशील हो।
मारुततुल्यवेगं : पवन जैसा वेग — यह प्राणशक्ति का प्रतीक है। जीवन में ऊर्जा, उत्साह और निर्भयता का स्रोत।
जितेन्द्रियं : जिसने इन्द्रियों को जीत लिया — दार्शनिक रूप से यह बताता है कि सच्ची शक्ति बाहरी विजय में नहीं, आत्म-संयम में है।
बुद्धिमतां वरिष्ठम् : बुद्धिमानों में श्रेष्ठ — ज्ञान केवल पुस्तकीय नहीं, बल्कि विवेकयुक्त आचरण है। हनुमान जी बल और बुद्धि का संतुलित रूप हैं।
श्रीरामदूतं : राम के दूत — यहाँ अहंकार-त्याग का चरम रूप है। वे स्वयं को कर्ता नहीं, केवल ईश्वर की इच्छा का माध्यम मानते हैं।
शरणं प्रपद्ये : मैं शरण लेता हूँ — यह कथन बताता है कि आत्म-समर्पण कमजोरी नहीं, बल्कि आध्यात्मिक परिपक्वता है।
सारार्थ
यह श्लोक सिखाता है कि जीवन में वेग हो, पर विवेक के साथ; शक्ति हो, पर संयम के साथ; और ज्ञान हो, पर अहंकार के बिना।
हनुमान जी इसी समन्वय का दार्शनिक आदर्श हैं।